दो जून की रोटी मिलती, हम हैं किस्मत वाले ।
कितने लोग भूखे रहते हैं, मिलते नहीं निवाले ॥
हाथ ठेला लिए धूप में, आम-जाम चिल्लाए ।
तब जाकर घर वालों को वो, आधा पेट खिलाए ।
रोटी की खातिर बेचे, गुपचुप चने मसाले ॥1॥
कितने लोग भूखे रहते हैं, मिलते नहीं निवाले ॥
फूल बेचने वाले बच्चे, ढूंढे दृष्टि आस की ।
आधा तन कपड़ा पहने जो, खेती करें कपास की ।
जूते बेचने वालों के, पैरों में भी है छाले ॥2॥
कितने लोग भूखे रहते हैं, मिलते नहीं निवाले ॥
जिनके कांधे पे हल है, उनके भी आंसू झलके।
हलधर की हल-आशा जिनसे, वो हैं कितने हल्के ।
अन्नदाता करे फाँके चाहे, कितनी फसल उगाले ॥3॥
कितने लोग भूखे रहते हैं, मिलते नहीं निवाले ॥
बहुत विवश कर देती है ये, दो जून की रोटी ।
और विवश का लाभ उठाते, नीयत जिनकी खोटी ।
तन भी कर देना पड़ता तब, औरों के हवाले ॥4॥
कितने लोग भूखे रहते हैं, मिलते नहीं निवाले ॥
भरे पेट का शौक है कविता, बात ये कड़वी सच्ची ।
जितनी पीड़ा हो गाथा मैं, समझी जाती अच्छी ।
भूख पे कविता लिखके पहने, हैं मंचों पर माले ॥5॥
कितने लोग भूखे रहते हैं, मिलते नहीं निवाले ॥
दो जून की रोटी मिलती, हम हैं किस्मत वाले ।
कितने लोग भूखे रहते हैं, मिलते नहीं निवाले ॥
-अंजुमन 'आरज़ू'✍©🙏
02/06/2018
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