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फूलों संग शूलें

कौन है दुनिया में ऐसा जो बस झूलों में झूले ।
सहना पड़ता है सबको ही फूलों के संग शूले ।।

फूल का रूप खिलाने को ज्यों धूप ज़रूरी है ।
जीवन में भी बिन संघर्ष हर बात अधूरी है ।
मुस्कान फूल की याद है पर संघर्षों को क्यों भूले ।।
सहना पड़ता है सबको ही फूलों के संग शूले ।।

है आसान ऋतु वसंत में फूलों का खिल जाना ।
पर मैंने तो भीषण गर्मी के गुलमोहर को माना ।
शिरीष को है सलाम जो हर मौसम को कबूले ।
सहना पड़ता है सबको ही फूलों के संग शूले ।।

देख कमल को गौर से कीचड़ में मुस्काता है ।
विपरीत परिस्थितियों में खिलके ईश को भाता है ।
कर उन्नत व्यक्तित्व फूल सा चल गगन को छूले ।
सहना पड़ता है सबको ही फूलों के संग शूले ।।

कौन है दुनिया में ऐसा जो बस झूलों में झूले ।
सहना पड़ता है सबको ही फूलों के संग शूले ।।

     -अंजुमन 'आरज़ू'©✍

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