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काबिल

अपने सामर्थ्य का खुद पता दूंगी में।
*मैं भी काबिल हूं इक दिन बता दूंगी मैं ।।*

एक मुद्दत से दुनिया सताती रही,
मेरी कमजोरियां ही गिनाती रही ।
देखकर खुद को उनकी नजर से सदा,
खुद को ही फिर भला क्यों सता दूंगी मैं।।
*मैं भी काबिल हूं इक दिन बता दूंगी मैं ।।*

मानती हूं कि धीमी गति है मेरी,
किंतु प्रत्युत्पन्न सी मति है मेरी ।
हारती है सदा ही मति से गति,
ये फिर इक दिन जमाने जता दूंगी मैं ।।
*मैं भी काबिल हूं इक दिन बता दूंगी मैं ।।*

इतना आसान पाना कहां मंजिलें,
सबकी राह में आती ही हैं मुश्किलें ।
हौंसलों से सभी मुश्किलें पार कर,
आसमां भी कदम पर नता दूंगी मैं ।।
*मैं भी काबिल हूं इक दिन बता दूंगी मैं ।।*

शब्द मेरे सभी फूल बनकर खिलें,
बन के परिचय की खुशबू जहां से मिलें।
शारदे भरदे वर से मेरी लेखनी,
नित सृजन की सुनहरी लता दुंगी मैं।।
*मैं भी काबिल हूं इक दिन बता दूंगी मैं ।।*

       -अंजुमन 'आरज़ू'©✍

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