✍ लघु कथा
जाड़ों के दिन थे, कड़कड़ाती सर्दी पड़ रही थी, विद्यालय सुबह 7:30 से शुरु हो जाता था, बहुत से निर्धन विद्यार्थियों के पास ऊनी कपड़े नहीं थे,अतः शिक्षकों ने अपनी अपनी कक्षाएं बाहर खेल मैदान में लगा ली थी । अर्धवार्षिक परीक्षा हो चुकी थी, सरिता की कक्षा में त्रिपाठी सर छात्रों में सुधार हेतु उन्हें उत्तर पुस्तिका दिखा रहे थे । उत्तर पुस्तिका देखते-देखते जब काफी समय हो गया और सर ने कॉपियां वापस मांगनी शुरू की तो सरिता ने खड़े होकर पूछा,सर! कक्षा में प्रथम स्थान पर कौन रहा.....?
तब त्रिपाठी सर ने अपनी अंको वाली सूची निकाली, और बताया...
फला अनुक्रमांक प्रथम स्थान पर हैं, आप खड़े हो जाइए.....
फला अनुक्रमांक द्वितीय और फला तृतीय आप भी अपने अपने स्थान पर खड़े हो जाइए, फिर उन्होंने ने सरिता की ओर देखते हुए कहा- अरे तुम तो पहले से ही खड़ी हो। त्रिपाठी सर ने आगे कहां, "सब इनके लिए जोरदार तालियां बजाइए", कक्षा तालियों से गूंज उठी । उसी गड़गड़ाहट के बीच पीछे से एक व्यंग्यात्मक आवाज आई- इन्हें तो अवार्ड मिलना चाहिए ।
इस आबाज को सुनकर कक्षा में सन्नाटा सा छा गया था । त्रिपाठी सर ने भी सुना था वह व्यंग वाक्य । डांटते हुए उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा था-- "किसने कहा है ये.... ???खड़े हो जाओ......!!! पर किसी ने चूं न की,,,। सरिता जानती थी, कि यह शरारत रजत के सिवा और कोई नहीं कर सकता । पिछले साल विद्यालय के वार्षिकोत्सव में सुगम संगीत गायन प्रतियोगिता में, वह सरिता से हारा था, तब से, जब-तब यूं ही ताने देता रहता था । सरिता चुप ही रहती थी अक्सर, पर आज वह कुछ ज्यादा ही उदास हो गई, रुआँसी सी हो गई थी।
घर जाकर उसने अपनी माँ से सारी बात बताई, और कहा- "माँ कक्षा में सब जानते हैं, कि वह जब-तब इसी तरह से व्यंग करता रहता है, फिर भी किसी ने उसका नाम नहीं लिया । पर मैं अब और सहन नहीं कर सकती, कल मैं त्रिपाठी सर से उसकी शिकायत करूंगी ।" माँ ने सरिता के कंधे पर हाथ रखकर बहुत धीरे, किंतु प्रभावशाली ढंग से, यह सलाह दी थी- "नहीं ..... तुम अपनी प्रतिभा की रेखा थोड़ी और बड़ी खींचो । किसी से दबना नहीं, अपनी बात बेहिचक सामने रखना, लेकिन सिर्फ़ शोर मचाने के लिए चीखना नहीं, चिल्लाना नहीं । पहले अपनी प्रतिभा को शोर मचाने देना .....।
और तब, सरिता ने अपनी माँ की सलाह मानकर, रजत को कुछ न कहते हुए, खुद को तराशने में, सारा सामर्थय लगा दिया ।
समय बीता, परीक्षाएं हुई, और जब परिणाम आया, तो सरिता सिर्फ विद्यालय में नहीं, बल्कि प्रदेश की प्रावीण्य सूची में, जिले का प्रतिनिधित्व कर रही थी । वह स्वतंत्रता दिवस समारोह में, जिले में सम्मानित हुई । अगले सत्र में गणतंत्र दिवस समारोह के लिए, विद्यालय की ओर से सरिता को अवार्ड लेने के लिए, आमंत्रित किया गया । वहाँ रजत भी आया था, वो बस हाध मलता, सरिता को अवार्ड लेता देखता रह गया । सरिता तालियों की गड़गड़ाहट के बीच, अवार्ड हाथ में लिए लौटी तो देखा, रजत वहां से जा चुका था ।
माँ की सीख मानकर, आज सरिता की प्रतिभा, इतनी निखर गई है, कि उसने सुगम संगीत के क्षेत्र में भी काफी सारे पदक प्राप्त किए हैं, और वह अपनी प्रतिभा को साबित कर सकने में सफल रही है । अब उसे किसी व्यंग्य का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं पड़ती । उसकी प्रतिभा अब सब कुछ कह देती है ।
13-06-2018
✍ अंजुमन 'आरज़ू'
स्वरचित एवं मौलिक कहानी
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