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नारी की परिभाषा


क्या बांधेगी नारी तुझको  कोई एक परिभाषा ।
सहन शक्ति तू,सृजन शक्ति तू,तू आशा की भाषा ॥

स्नेहमयी ममता की मूरत, प्रेम की छाया ठंडी ।
पतन पाप पाखंड जले जब,बन जाती रंणचण्डी।
अबला नहीं है नारी, तू तो हर निर्बल की आशा ॥1॥
क्या बांधेगी नारी तुझको  कोई एक परिभाषा ।
सहन शक्ति तू,सृजन शक्ति तू,तू आशा की भाषा ॥

सतयुग में तारा त्रेता में सीता पर भी बीता ।
द्वापर में द्रौपदी तो कलयुग भी है कहाँ ये रीता ।
आसिफा,दामिनी,निर्भया,कितनी रोज़ी, नताशा ॥2॥
क्या बांधेगी नारी तुझको  कोई एक परिभाषा ।
सहन शक्ति तू,सृजन शक्ति तू,तू आशा की भाषा ॥

अन्नपूर्णा, गृहलक्ष्मी बन सारे फ़र्ज़ निभाती है ।
पूजनीय है पर घर में भी सम्मान कहाँ पाती है ।
मंदिर की देवी बनना नहीं नारी की अभिलाषा ॥3॥
क्या बांधेगी नारी तुझको  कोई एक परिभाषा ।
सहन शक्ति तू,सृजन शक्ति तू,तू आशा की भाषा ॥

    -©अंजुमन 'आरज़ू'✍

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