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कितने स्वाभिमानी

क्या लिख पाऊंगी मैं अपने, पापा की कहानी ।
बड़े मेहनती अनुशासित और, कितने स्वाभिमानी ॥

उनके कांधे बैठ के हमने, देखी दुनिया सारी ।
बचपन की ज़िद पूरी करते, पिता भूल लाचारी ।
उनके संघर्षों से अपनी, जीवन राह सुहानी ॥1॥
बड़े मेहनती अनुशासित और, कितने स्वाभिमानी ॥

एक खिलौना टूट गया तो, देख हमारे गम को ।
मितव्ययिता का पाठ पढ़ाके, समझाया था हमको ।
आज सहन कर लो मुश्किल तो, कल होगी आसानी ॥2॥
बड़े मेहनती अनुशासित और, कितने स्वाभिमानी ॥

दुनिया की गर्मी को सहने, लायक हमें बनाया ।
अग्निकुंड खुद बना के हमको, कुंदन सा तपाया ।
करुणा का सागर मन में पर, आंखों में नहीं पानी ॥3॥
बड़े मेहनती अनुशासित और, कितने स्वाभिमानी ॥

कहते जगती जीती जाती, है बस अपने दम से ।
घबराना ना मेरी बिटिया, तुम तम के सितम से ।
उनकी आशावादी बातों, से जीवन नूरानी ॥4॥
बड़े मेहनती अनुशासित और, कितने स्वाभिमानी ॥

क्या लिख पाऊंगी मैं अपने, पापा की कहानी ।
बड़े महनती अनुशासित और, कितने स्वाभिमानी ॥

      -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
17/06/2018

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