लघु कथा
कल मतदान होना था । इस हेतु कल का अवकाश घोषित किया गया था । और आज, बसों के अभाव में, स्कूल कॉलेज के छात्रों ने तो अघोषित छुट्टी मना ली थी । पर कर्मचारियों को तो अपने कार्यालय जाना ही था ।
सुबह के समय कुछ वे बसें लगी हुई थीं, जिनका अधिग्रहण भी दोपहर तक हो जाना था । कुछ लोग इन बसों से, तो कुछ अपने निजी वाहनों से, कार्यालय पहुंच रहे थे । कल्पना भी यही सोच कर कि - "शाम की शाम से है, कोई साधन नहीं मिलेगा, तब घर से किसी को बुला लूंगी, अभी से उन्हें क्यों परेशान करूं... आखिर उनके भी तो अपने काम हैं ना ।"उसी बस में अपने कार्यालय पहुंच गई ।
रोज की तरह आज भी शाम हुई, पर आज सड़कों पर सन्नाटा पसरा पड़ा था । जो कर्मचारी निजी वाहन से आए थे, वह निकल चुके थे, कुछ लोगों ने लिफ्ट लेकर अपना काम बना लिया, पर अपने सरल स्वभाव के कारण कल्पना से लिफ्ट लेते न बना । आसपास की नीरवता और अकेलापन उसे कुछ आशंकित भी कर रहा था । वह घर से किसी को बुला लेने की सोच ही रही थी कि उसे एक ऑटो रिक्शा आता दिखाई दिया । उसने खुशी से उसे रोका । रिक्शा रुका और रिक्शेवाला बोला - "बहन जी प्रणाम!!! मैं आपको छोड़ देता पर....!!! मैंने पी रक्खी है ।" पूरा वाक्य बोलने से पहले ही शराब की दुर्गंध ने उसे सब कुछ बता दिया था । अनजान भय से आशंकित वह पैदल ही थोड़ा आगे बढ़ गई । रिक्शेवाला भी अपना रिक्शा लिए धीरे-धीरे उसी ओर बढ़ चला, और बोलने लगा -" दीदी जी ....मैं आपको छोड़ .... देता पर मैंने........।" कल्पना बोली- "कोई बात नहीं भैया, आप जाइए, मैं किसी और साधन से आ जाऊंगी........।" रिक्शे वाला फिर बोला - "दीदी ....जी मैं आपको छोड़ ....देता पर मैंने......... मुझे अच्छा नहीं लग रहा दीदी....... मैं आपको पहचानता हूं, आपकी बहुत इज्जत करता हूं, आपको यहां अकेले......पर मैंने पी.....मैं पीता नहीं दीदी, पर कल चुनाव है ना, जाने किस ने मुझे.....
कल्पना तेज कदमों से चाय की दुकान की और बढ़ रही थी, और रिक्शेवाला भी उसके पीछे पीछे कुछ बोलता हुआ बढ़ता जा रहा था । तभी वहां एक बाइक रुकी, बाइक सवार ने उस रिक्शे वाले को एक भद्दी सी गाली दी और बोला - "क्यों बे ! मैडम को परेशान कर रहा है, अभी धुनाई कर देता हूं साले की, सारी उतर जाएगी....।" कल्पना ने मुड़कर देखा, वह उस पर हाथ छोड़ने ही वाले थे, वह वापस गई और उसने उन्हें कहा - "नहीं ये मुझे परेशान नहीं कर रहे थे, इन्होंने तो खुद मुझे बता दिया कि यह मुझे ले जाने में समर्थ नहीं है ।" वे कल्पना की बातों को अनसुना कर, उसे गालियां दे रहे थे, और वह रिक्शेवाला हाथ जोड़कर बोल रहा था - "दीदी.... जी नमस्ते.... मैं आपको छोड़ देता पर.... भैया मेरी दीदी हैं ये.... मैं इन्हें..... नहीं भैया.... मैंने पी....भैया भैया ये मेरी दीदी.....
पीछे से संजय जी आ रहे थे, उन्होंने कल्पना को इस तरह देखा तो रुके, और वह भी ऑटो रिक्शा वाले को डांटने लगे, उसे वहां से जाने को कहा, बाइक सवार को भी जाने के लिए कहा, कल्पना को अपने साथ घर चलने के लिए कहा । कल्पना उन्हें जानती थी, अतः वह उनके साथ हो ली, पर वह सोच रही थी, कि आखिर मुझे परेशान कौन कर रहा था ..... मेरे सहकर्मी, जिन्होंने आज के दिन भी मुझे साथ चली को नहीं पूछा......??? या वह मनचला युवक, जो मेरी मदद करने के नाम पर गाली गलोच कर रहा था...? या वह रिक्शेवाला....!! जो नशे में होते हुए भी सच बोल रहा था... पीने के बाद भी जिसने अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं किया ...। या वोट बैंक की गंदी राजनीति, जो मुफ्त में शराब बांटकर, परिणाम अपने पक्ष में कर लेना चाहती है ।
रचना तिथि08/01/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है
- सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र
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