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अब सांझ ढली


अब साँझ ढली घर चल साथी,
पूजन वंदन दीया बाती ।
कल भी तो बिटिया बोली थी,
माँ याद तुम्हारी है आती ॥

प्रतिस्पर्धा कैसी छाई है,
दोनों को करनी कमाई है ।
तब होते हैं सपने साकार,
तब घर लेता सार्थक आकार ।
माँ का चश्मा पा की बनियान,
और बच्चों का शिक्षा अभियान ।
सब्ज़ियाँ दाल फल नाशपाती ॥
अब साँझ ढली घर चल साथी ॥

जब 'आना' सीखी थी वाचन,
तब मुझे काम था निर्वाचन ।
'आनू' ने जब सीखा बढ़ना,
सिर पर खड़ी थी जनगणना ।
बच्चों की तुतलाती भाषा,
गिर-गिर संभलने की आशा ।
कितना कुछ छूट गया हमसे,
ये सोच के आँखें भर आती ॥
अब साँझ ढली घर चल साथी ॥

    -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
मई 2018

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