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कुछ मेरी भी तुम सुन लेते

सरला नारी को उन* लेते,
सब निर्णय तुम खुद बुन लेते ।
मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं,
*कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥*

मेरा हर सृंगार तुम्ही से ,
बिछुए कंगन हार तुम्ही से ।
फिर भी मुझको भेज दिया वन,
जीत तुम्हें से हार तुम्ही से ।
अग्नि परीक्षा देकर भी तो,
किस्मत को ना हम धुन लेते ।
सब निर्णय तुम खुद बुन लेते ।
*कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥*

रोड़ा बन हम राह ना आते,
बस तुम मुझसे कह कर जाते ।
तुम भी गौतम से ही निकले,
भूल गए सब नेह के नाते ।
मैं तप करती यशोधरा सी,
जग का हित मुझ संग गुन लेते ।
सब निर्णय तुम खुद बुन लेते ।
*कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥*

कितनी कन्या कोख में मारी,
अत्याचार है अब भी जारी ।
कैसे में *बदलाव* मान लूं,
हर युग में नारी बेचारी ।
जाने क्या अपराध हुआ है,
स्त्री से बदला चुन चुन लेते ।
सब निर्णय तुम खुद बुन लेते ।
*कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥*

कब से मैं बैठी हूं गुमसुम,
राहों के सब काँटे चुन चुन ।
ये काँटे भी फूल बनेंगे,
संग चलेंगे जब भी हम तुम ।
सुख की कलियां दुख के कांटे,
खुश होकर हम तो चुन लेते ।
सब निर्णय तुम खुद बुन लेते ।
*कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥*

सब निर्णय तुम खुद बुन लेते ।
सरला नारी को उन लेते,
मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं,
*कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥*

©अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
24/11/2018

उन* = एक कम

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