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मरहले दुश्वारियों के

ग़ज़ल

मरहले दुश्वारियों के पेश आए सैकड़ों
फिर भी तो हम मुस्कुराए ग़म छुपाए सैकड़ों ।

मैंने माना एकता में है बहुत ताकत मगर
एकता के नाम फिर क्यों दल बनाए सैकड़ों ।

चांद सूरज की यहां तन्हा भी इक पहचान है
ये सितारे रोशनी मिल कर न पाए सैकड़ो ।

ख्वाहिशों की जुस्तजू में उम्र भर भटका किए
इक ख़ुशी पाने की खातिर ग़म उठाए सैकड़ों ।

घुप अंधेरा, जलता सहरा, तेज बारिश, बिजलियां
मुश्किलों ने जाल राहों पर बिछाए सैकड़ों ।

ठोकरों से आबलापाई से मत घबराइए
बिन थके जो चल पड़े मंजिल वो पाए सैकड़ों

नेकियां भी कुछ कमा लो जिंदगी में आरज़ू
लाल ओ गोहर तो बसर ने हैं कमाए सैंकड़ों ।

     -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
28/04/2019

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