हमने ग़ज़ल को जाना है अब ।
रचना एक तराना है अब ।
अरबी का इक शब्द ग़ज़ल है ।
हिंदी ने भी माना है अब ।
इस की यात्रा काफी लंबी ।
मिलके और बढ़ाना है अब ।
संसद से सड़कों तक छाई ।
इसको और सजाना है अब ।
मेरी ग़ज़ल कनक हो जाएं ।
पारस मात्र छुआना है अब ।
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
14/06/2018
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