संस्मरण🙏🌼
लगभग एक-डेढ़ दशक पूर्व जब मैं जबलपुर के प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय में बीएड करने हेतु आई , तब पंडित लज्जा शंकर झा मॉडल हाई स्कूल के पास, हॉस्टल में रहती थी।
मेरी रुचि आरंभ से ही हिंदी साहित्य में रही है, और मैं यहाँ आने के पूर्व से ही गजलें लिखती थी । इस अनजान महानगर के अनेक साहित्यकारों कवियों के नाम और उनकी रचनाओं से मैं पूर्व से ही परिचित थी। इनमें-पंडित भवानी प्रसाद तिवारी, व्यंग शिरोमणि हरिशंकर परसाई, गजानन माधव 'मुक्तिबोध', रामेश्वर शुक्ल 'अंचल', सुभद्रा कुमारी चौहान, नर्मदा प्रसाद खरे, रामानुज लाल श्रीवास्तव, श्री इंद्र बहादुर खरे, श्रीमती छाया त्रिवेदी, श्रीमान पांडे गोविंद प्रसाद तिवारी, श्याम मोहन दुबे, ललित श्रीवास्तव, राजकुमार सुमित्र, आदि के नाम मुझे स्मरण हैं ।
पी एस एम महाविद्यालय में मेरी आदर्श शिक्षिका की तलाश खत्म हुई, मुझे वहां प्रख्यात कवियत्री एवं कहानीकार आदरणीय श्रीमती छाया त्रिवेदी जी शिक्षिका के रुप में मिलीं । शिक्षण प्रशिक्षण के दौरान 40 पाठ योजना पढ़ाने के लिए जब मुझे व्यवहारबाग का एक विद्यालय मिला, तो मैंने आदरणीय त्रिवेदी मैडम को अपनी दृष्टि बाधिता की समस्या से अवगत करा, उनसे निकट का कोई विद्यालय देने का आग्रह किया, तव उन्होंने मेरी सहायता की, और इस तरह मुझे हॉस्टल से सबसे निकट का, पंडित लज्जा शंकर झा मॉडल स्कूल मिल गया। जब मैं वहां पहुंची, तो देखा विद्यालय भवन बहुत पुराना है, शायद अंग्रेजों के जमाने का है, फिर मुझे परसाई जी की 'बोलती रेखाएँ' की बात स्मरण हो आई कि यह वही विद्यालय है, जहां पहले कभी मुक्तिबोध और फिर परसाई जी भी शिक्षक रह चुके थे। बहर हाल समय बीतता गया, शिक्षण सत्र के मध्य में, महाविद्यालय में वार्षिकोत्सव का आयोजन हुआ, जिसमें मैंने सुगम संगीत के अंतर्गत स्वरचित ग़ज़ल प्रस्तुत करके प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। इससे मैं अपनी आदर्श शिक्षिका की और अधिक प्रिय स्नेह-पात्र बन गई, तथा सौभाग्य है कि तब से अब तक मैं उनकी स्नेह पात्र बनी हुई हूं।
खट्टी मीठी यादों के साथ शैक्षणिक सत्र लगभग बीतने को था, महाविद्यालय से आदरणीय श्रीमती छाया त्रिवेदी जी के संपादन में वार्षिक पत्रिका प्रकाशित हो रही थी। इस हेतु मैंने भी अपनी ग़ज़ल तैयार कर रखी थी। इसी दौरान शिक्षण संस्थान में एक दिन मेरा परिचय श्रीमती ममता दुबे से हुआ। बातों ही बातों में साहित्य पर चर्चा चल पड़ी। तब मैंने उन्हें बताया कि मैं भी ग़ज़लें लिखती हूं।तब ममता जी ने कहा कि हमारे पापा जी(स्वसुर जी), श्री श्याम मोहन दुबे भी साहित्यकार हैं, और कविताएं, कहानियाँ, लेख, व्यंग आदि लिखते हैं, जो नगर, प्रदेश और देश के प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पूर्व परिचित साहित्यकार का नाम सुनकर मैं खुशी से उछल पड़ी, और स्नेह से उनका हाथ थाम कर बोली, "ममता जी प्लीज मुझे उनसे मिलवा दीजिए",फिर ममता जी मेरी ग़ज़ल अपने साथ ले गयीं और अपना पता मुझे दे गयीं । अगले दिन उन्होंने मुझे बताया कि पापाजी को तुम्हारी रचनाएँ बहुत पसंद आई,बहुत अच्छी लगी हैं।
कुछ दिनों बाद मैं अपनी एक सहेली के साथ, उनसे मिलने उनके घर पहुंच गयी। वहाँ मैंने देखा कि कितने ही सम्मान-पत्र उनके कमरे की दीवारों की शोभा बढ़ा रहे हैं। महादेवी वर्मा और हरिशंकर परसाई जैसे लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकारों के साथ, श्री श्याम मोहन दुबे जी की तस्वीरें सजी है, यह सब देखकर मुझे लगा कि इतने बड़े साहित्यकार से मिलने आकर कहीं मैंने कोई गलती तो नहीं कर ली, वे मुझसे मिलेंगे भी या नहीं, अगर मिल भी जाएंगे तो मैं उनसे क्या बात करूंगी ।आदि..... आदि....... विचार मेरे मन मस्तिष्क को घेरे हुए थे और तभी सफेद कुर्ता पजामा में फरिश्तों सी मासूमियत लिए श्री श्याम मोहन दुबे जी मेरे सामने थे। मैंने उन्हें प्रणाम किया और हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' उन्हें भेंट स्वरूप दी। उनकी बातचीत, और व्यवहार से लगा ही नहीं कि मैं किसी अजनबी व्यक्ति या परिवार से मिल रही हूँ । उन्होंने मुझे महसूस ही नहीं होने दिया कि वे एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं और मेरी तो अभी ढंग से शुरुआत भी नहीं हुई। उनसे मिलकर मैं बहुत ही अभिभूत थी, इसका एक कारण यह भी था कि वे प्रख्यात व्यंगकार श्री हरिशंकर परसाई के शिष्य रह चुके थे। परसाई जी पर कई लेख भी लिखे हैं उन्होंने।
प्राथमिक शिष्टाचार के बाद अंत में उन्होंने मुझे अपना प्रथम काव्य संग्रह 'शब्दों की गंगा' और व्यंग संग्रह 'राग-रंग व्यंग के संग' भेंट में दिया तथा साथ ही कहा कि "घर पर तुम्हारी उम्र के सभी लोग मुझे पापाजी कहकर संबोधित करते हैं, तुम भी मुझे पापाजी कहा करो। आज से तुम मेरी धर्मपुत्री हो", उन्होंने मेरे सिर पर अपने आशीर्वाद का हाथ रख दिया, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती माया दुवे ने, जो अब मेरी धर्म माता बन चुकी थी, पूरे परिवार के स्नेह के धागों से बुनी हुई एक साड़ी भेंट स्र्वरूप मुझे दी और इस प्रकार मैं उनका ढेर सारा स्नेह आशीर्वाद लेकर लौट आई ।
अब यह अनजान शहर मेरे लिए अनजान नहीं रहा, अब श्री श्याम मोहन दुबे मेरे धर्मपिता हो चुके हैं इस परिवार से मुझे भरपूर स्नेह और मार्गदर्शन मिला।आज भी फोन पर संवाद और पत्र व्यवहार बना हुआ है ।
अब मुक्तिबोध या परसाई जी का जब भी प्रसंग आता है, तो मैं अपनी कक्षा में बड़े गर्व से कहती हूं कि जिस विद्यालय में मुक्तिबोध और परसाई जी ने पढ़ाया है, तथा जहां श्री श्याम मोहन दुबे जी पढ़े हैं, उसी विद्यालय में मुझे भी पढ़ाने का सौभाग्य मिला। और हरिशंकर परसाई जी के शिष्य की मैं शिष्या भी हूँ ।
B.Ed करने के बाद मैं छिंदवाड़ा चली आई । दुबे जी ने मेरी ग़ज़लें अपने पास ही रख ली थी, उन्होंने उन्हें देश के प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में भेज कर मुझे देश की ग़ज़लकारा के रूप में ख्याति दिलाई। वैसे तो मेरी रचनाएं हमारे निज प्रकाशन में प्रकाशित हो चुकी थी, किंतु वास्तविक प्रकाशन अब मेरे धर्म पिता के माध्यम से ही शुरू हुआ था। आज भी मैं अपनी सभी रचनाएं पहले उन्हें भेजती हूं, और फिर वे ही विभिन्न प्रकाशकों को भेजकर प्रकाशित करवाते हैं। बीच-बीच में मुझे और अधिक लिखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, अच्छा लिखने पर दुलारते हैं, और ना लिखने पर प्यार से डांट भी लगाते हैं।
परिचय के आत्मीय संबंध में बदल जाने के बाद उन्होंने मेरे भाई के विवाह पर सपरिवार हमारा आतिथ्य स्वीकार कर हमे अनुग्रहीत किया ।
जब दुबे जी के दूसरे काव्य संग्रह 'अविरल बहो नर्मदा' के प्रकाशन की योजना बनी, तब उन्होंने पुस्तक में प्रकाशित करने हेतु मुझसे आलेख मंगवाकर मुझे सम्मान दिया, उनके तृतीय काव्य संग्रह 'अविरल बहो नर्मदा' में 'कवि का व्यक्तित्व एवं कृतित्व' मेरे ही द्वारा लिखा हुआ है। मेरे आलेख को अपनी काव्यधारा में स्थान देकर उन्होंने मुझे गौरवान्वित किया।
पुस्तक विमोचन समारोह में भी सादर आमंत्रित किया, साथ ही पाथेय सृजनश्री अलंकरण से मुझे विभूषित किए जाने मे भी मेरे धर्म पिता की अहम भूमिका है।ये उन्हीं का आशीर्वाद है कि मुझे अंजान शहर में आत्मीय रिश्तों की सौगात मिली ।
-अंजुमन 'आरजू"
🙏01/05/2018
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