माना कि यह जीवन, संकुचन नहीं विस्तार है ।
किन्तु मुझको अपने पापा से बेहद प्यार है ॥
गोदावरी ने विस्तार रोका, ऋषि अगस्त के कमंडल में ।
मेरा भी विस्तार रुक रहा, परिस्थितियों के बबंडर में ।
गोदावरी ने पति के लिए, तो मैंने अपने पिता के लिए ।
दोनों ने ही प्रेमवश रोका अपना प्रसार है ।
किन्तु मुझको अपने पापा से बेहद प्यार है ॥
आज कमंडल मे सिमटी ,कल कौआ कोइ न आएगा ।
मेरा संकुचित जीवन, नदी सा प्रवाह नहीं पाएगा ।
सरस्वती सूख भी गई तो क्या, संगम तो हो जाएगा ।
अपनों की खातिर मिट जाना,जीवन का यही तो सार है ।
किन्तु मुझको अपने पापा से बेहद प्यार है ॥
मात पिता ने इतना त्यागा ,क्या मैं पद नहीं तज सकती ।
मुक्त गगन में उड़ना छोड़, पिंजरे में नही सज सकती ।
अपनी उड़ान से भली मुझे, लगती पिता की मुस्कान है ।
बचपन से अब तक इनके ,कितने मुझ पर उपकार हैं ।
किन्तु मुझको अपने पापा से बेहद प्यार है ॥
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
2006
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मेरी इस रचना में अंतर कथाएं निहित हैं
पहली मेरे संघर्ष की- मेरी नियुक्ति वरिष्ठ अध्यापक के पद पर घर से काफी दूर हुई थी। इस वजह मैं अपनी मां के साथ वहां रहती थी, इससे मां और पिता अपने जीवन में पहली बार इस तरह अलग अलग हो गए थे। और पिता काफी बीमार रहने लगे थे । परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि मुझे उस जॉब को छोड़ना पड़ रहा था और उससे छोटे पद पर आना पड़ रहा था। इसलिए यह पंक्ति बनी -
माना कि यह जीवन संकुचन नहीं विस्तार है।
किंतु मुझको अपने पापा से बेहद प्यार है।।
दूसरी अंतर्कथा पौराणिक है ।
गोदावरी नदी का विवाह अगस्त ऋषि से हुआ था, वे उनके प्रेम में जनकल्याण भूलकर अपने पति के कमंडल में सिमट गई थी । विष्णु भगवान ने पाया कि इस तरह तो धरती का कल्याण रुक जाएगा, तो वह कौवा बन कर आए और ऋषि अगस्त के कमंडल को पैर मारा, जिससे गोदावरी नदी फिर बह निकली । अर्थात गोदावरी को पुनः विस्तार का अवसर मिला ।
तीसरा प्रसंग भी है-
गंगा यमुना सरस्वती के संगम वाला,यह तो सभी को ज्ञात ही है।
सादर समर्पित🙏🙏🙏
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