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धरती की संतान


हम वसुधा के रहने वाले  धरती की सन्तान हैं ।
पर शायद हम ने खो दी अपनी सुखद पहचान है ॥

नदियों की लहरों में जागा गीत नया संगीत नया ।
पर्वत सागर करते हैं संघर्ष के लाखों गीत बयां ॥
हरियाले खेतों से पाये हमने परम वरदान है ॥
पर शायद हमने खो दी अपनी सुखद पहचान है ॥

धरती पुत्र कहला कर कभी हम फूले नहीं समाते थे ।
पोषित हो कर धरती माँ से गीत खुशी के गाते थे ।
अब स्वार्थ पूर्ण लालच से लेकिन दोनों ही परेशान है ॥
पर शायद हमने खो दी अपनी सुखद पहचान है ॥

कुटुम्भकम् वसुधैव सिखाते भाई भाई के हैं नाते ।
राजनीति का रंग चढ़ा यूँ भूल गये सब सच्ची बातें ।
मानवता को भूल गये अब हिंदू या मुसलमान हैं ॥
पर शायद हमने खो दी अपनी सुखद पहचान है ॥

हम वसुधा के रहने वाले धरती की सन्तान है ।
पर शायद हम ने खो दी अपनी सुखद पहचान है ॥

    -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
21-04-2018

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