देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
भांति-भांति के भेदभाव से, मुक्त कराना बाकी है ॥
देश बँटा है धर्म धर्म में, धर्म बँटे फिर जाती ।
सब धर्मों का मूल एक क्यों, बात समझ नहीं आती ।
केवट ओ शबरी प्रसंग का, पाठ पढ़ाना बाकी है ॥1॥
देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
बेटी को तो सिखा रहे हम, जूडो और कराटे ।
पर बेटों को नहीं सिखाते, संस्कारों के पराठे ।
लिंग भेद के अंतर का ये, मूल कटाना बाकी है ॥2॥
देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
बद्री के केदार के रावल, केरल से हैं आते ।
दक्षिण सा सम्मान वो, उत्तर में भी तो हैं पाते ।
पूरब पश्चिम की संस्कृति का मेल कराना बाकी है ॥3॥
देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
प्रतिभाओं के दमन में देखो, मेरे देश की दुविधा ।
विपन्न और विपन्न है, संपन्नों को मिलती सुविधा ।
देश के पांव से आरक्षण का, शूल हटाना बाकी है ॥4॥
देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
कोयल है खामोश कि देखो अब सत्ता की शक्ति ।
मेंढक टर्रा कर करते हैं, कोरस में अभिव्यक्ति ।
गाल बजाने वालों की भी, ताल बजाना बाकी है ॥5॥
देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
आज भी भारत को इंग्लिश में, इंडिया इंडिया कहते ।
हिंदी की आंखों से आंसू, झर झर झर हैं बहते ।
अंग्रेजी में भी भारत को, भारत कहलाना बाकी है ॥6॥
देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
पैंसठ इखत्तर करगिल सब में, हमने धूल चटाई ।
पीठ में खंजर भोंके कहकर, हिंदी चीनी भाई ।
इन गद्दार पड़ोसियों को, धूल चटाना बाकी है ॥7॥
देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
देश मेरा है स्वतंत्र पर, सुतंत्र बनाना बाकी है ।
भांति-भांति के भेदभाव से, मुक्त कराना बाकी है ॥
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
12/08/2019
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