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जीवन सफर

अंकुरित
हुई   नन्ही
लाल कुमकुम सी
सुंदर प्यारी
कोपल

फिर
वह    कोपल
बढ़ती  पल   पल
मुस्काती और
हरियाती

हरीतिमा
भी    कहाँ
ठहरी, धीरे-धीरे
हो   जाती
पीली

छाता
है     फिर
प्रोढ़ता का रंग
सुनहरा सा
प्यारा

और
अंत     में
जो    रंग   आता
जीवन की
शाम

होता
ऐसे         ही
तो   मानव     का
जीवन सफर
तमाम

रचना तिथि 03/06/2018
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
     ©अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍

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