-अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'
मैं थी इक धरती न्यारी सी,
अपने सूरज की प्यारी सी ।
मुझको प्रियतम का प्रेम मिला,
मेरे आंचल में फूल खिला ।
गोदी महकी फिर क्यारी सी ॥
मैं थी एक धरती न्यारी सी ।
मेरा बेटा मानव आया,
बुद्धिजीवी सुंदर काया ।
पर उसे आ गया अहंकार,
भूला मेरे सारे उपकार ।
मृगतृष्णा का विस्तार किया,
मां का ही आंचल तार किया ।
अपने बेटे से हारी सी ॥1॥
मैं थी इक धरती न्यारी सी ।
राहों में वृक्ष की पंक्ति थी,
प्रियतम से मेरी बनती थी।
जब पुत्र मेरा मुझसे अकड़ा,
सूरज से हुआ मेरा झगड़ा ।
अब वो भी आंख दिखाता है,
और मुझ को बांझ बनाता है ।
पति-पुत्र प्रेम की मारी सी ॥2॥
मै थी इक धरती न्यारी सी ।
क्यों स्वार्थ भावना जागी है,
सुमति मानव की भागी है ।
मै पति-पुत्र के बीच फँसी,
निश दिन रोती कुछ रोज़ हँसी ।
चूनर मौसम की अस्त-व्यस्त,
कब थामे प्रियतम प्रेम- हस्त ।
सोचूँ बिरहन बेचारी सी ॥3॥
मै थी इक धरती न्यारी सी ।
मैं थी इक धरती न्यारी सी ।
अपने सूरज की प्यारी सी ॥
©®🙏✍
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