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ग़ज़ल - ज़िंदगानी दर्द की

इक मुकम्मल दास्तां है ज़िंदगानी दर्द की ।
मुस्कुराते लब के पीछे है निशानी दर्द की ॥

ठोकरों के बीज बो कर सींचती है अश्क से ।
ग़म की फसलें सब्ज़ करती बागबानी दर्द की ॥

गंगा यमुना में मिलाते कारखानो का ज़हर ।
अब नदी का ये सफ़र भी है रवानी दर्द की ॥

जख्म ये ज्वालामुखी के है ज़मी दिखला रही ।
दास्तां शबनम सुनाती आसमानी दर्द की ॥

साथ बचपन से रहा है हमसफ़र बन के सदा ।
दिल हमारा हो गया है राजधानी दर्द की ॥

वस्ल से खुशियां मिलेंगी क्या ये सच है साथियों ।
राम सीता का मिलन भी है कहानी दर्द की ॥

सुर्ख़ चुनरी थी तमन्ना तुम मगर लाए सफेद ।
सुर्ख़रू हो मैंने ओढ़ी वो निशानी दर्द की ॥

सुन रहे हो गीत मेरे अश्क़ आंखों में लिए ।
क्या मेरे नग़मे हुए हैं तर्जुमानी दर्द की ॥

दर्द में बस दर्द ही हमको दिया ये सच नहीं ।
ये ग़ज़ल भी 'आरज़ू' है महरबानी दर्द की ॥

रचना तिथि 07/04/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
     -सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र

Comments

  1. बहुत शानदार गजल
    बधाई

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  2. जी हार्दिक आभार आदरणीय

    ReplyDelete

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