ग़ज़ल
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
जब जब गले मिलेंगे यूँ पंडित इमाम से
गोहर मिलेंगे देश को अब्दुल कलाम से ।
ऐसी हवा चली है सियासत की आजकल
कोई ख़फ़ा अज़ां से कोई राम-राम से ।
मेहनत से हुई शीश महल जब ये झोपड़ी
पत्थर उछालता है कोई इंतक़ाम से ।
कल रात जाग जाग सुलाई थी जीसकी याद
फिर याद आ रहा है वही आज शाम से ।
कुछ इस तरह बसा है वो मेरे बज़ूद में
मुझको पुकारता है कोई उसके नाम से ।
मुमकिन नहीं था जिनके बिना घर सँवारना
बाहर किए गए हैं वो बद इंतजाम से ।
पाया है बुज़ुर्गों ने तज़ुर्बा अभी नया
रखने लगे हैं काम वो बस अपने काम से ।
21/04/2019
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