रोशनी के झुरमुटों का हें बसेरा बागबां ।
दूर करते हैं सदा जीवन अंधेरा बागबां ॥
रात जब काली हुई तो ये अटल ध्रुव हो गए ।
जिंदगी में खींच लाते हैं सवेरा बागबां ॥
हँस के सहना भी सिखाएं धूप ये संघर्ष की ।
नेह का पानी भी सींचे फिर ये मेरा बागबां ॥
गम सहे खामोश रहकर लब पे मुस्कानें सजा ।
संतति के वास्ते खुशियों का डेरा बागबां ॥
खाद तहजीवी जड़ों में डालता है प्यार से ।
तू फले फूले यही चाहे ये तेरा बागबां ॥
रचना तिथि 5/04/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
- सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र
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