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ग़ज़ल - बागबां

रोशनी के झुरमुटों का हें बसेरा बागबां ।
दूर करते हैं सदा जीवन अंधेरा बागबां ॥

रात जब काली हुई तो ये अटल ध्रुव हो गए ।
जिंदगी में खींच लाते हैं सवेरा बागबां ॥

हँस के सहना भी सिखाएं धूप ये संघर्ष की ।
नेह का पानी भी सींचे फिर ये मेरा बागबां ॥

गम सहे खामोश रहकर लब पे मुस्कानें सजा ।
संतति के वास्ते खुशियों का डेरा बागबां ॥

खाद तहजीवी जड़ों में डालता है प्यार से ।
तू फले फूले यही चाहे ये तेरा बागबां ॥

रचना तिथि 5/04/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
   - सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र

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