Skip to main content

ग़ज़ल - अल्फ़ाज़ की आवाज़

वज़्न-1222  1222  1222  1222

               ग़ज़ल

बड़े लोगों की सच्चाई हमें कुदरत बताती है ।
रखें प्यासा समंदर तिश्नगी नदिया बुझाती है ॥

करो जब दोस्ती तो अपने क़द को देखकर करना ।
मिली गंगा समंदर में तो कब गंगा कहाती है ॥

अगर ये भूख ना होती तो क्यों कर रक़्स ये होता ।
यही वो आग है जो रात दिन सबको नचाती है ॥

रची है साजिशें ऐसी कि सच को झूठ कर डाला ।
उसी झूठे को सच्चा मान दुनिया सर झुकाती है ॥

कहे तहजीब मुद्दत से कि बेटी रूप है माँ का ।
जनम लेने से पहले क्यों ये फिर दफनाई जाती है ॥

अंधेरे नफरतों के छू नहीं सकते हमारा दर ।
सदा रोशन रहे वो घर जहां माँ मुस्कुराती है ॥

यहां खामोशियां तेरी सुने क्या 'आरज़ू' कोई ।
जहां अल्फाज़ की आवाज़ भी मुश्किल से आती है ॥

09/04/2019
©®🙏
   - सुश्री अंजुमन मंसूरी आरज़ू ✍
छिंदवाड़ा मप्र

Comments

Popular posts from this blog

गरीबी गौरव गान

गरीबी  तो गौरव गान है । इसका बहुत सम्मान है । शबरी सा धीरज धर  के, कुछ तप भी करना पड़ता है । आस प्रभु की मन भरके, जग से लड़ना पड़ता है । तब बेर खाते श्री राम है ।। इसका बहुत सम्मान ह...

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...

कुछ मेरी भी तुम सुन लेते

सरला नारी को उन* लेते, सब निर्णय तुम खुद बुन लेते । मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं, *कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥* मेरा हर सृंगार तुम्ही से , बिछुए कंगन हार तुम्ही से । फिर भी मुझको भेज ...