ग़ज़ल
ज़िंदगी दरबदर आजमाती रही ।
पोंछ कर अश्क मैं मुस्कुराती रही ॥
राह के ख़ार से हौसला सींचकर ।
रोज़ उम्मीद के गुल खिलाती रही ॥
रात के बाद है रोशनी का सफ़र ।
फ़लसफ़ा ले सहर रोज़ आती रही ॥
देख आंगन में चिड़िया फुदकती हुई ।
मेरी नंही परी चहचहाती रही ॥
छाँव दे शाख़ से जब ये पत्ती गिरी ।
खाद बन पेड़ के काम आती रही ॥
रोज़ शामो सहर आरती ओ अज़ां ।
सर ज़मी हिंद की गुनगुनाती रही ॥
तीरग़ी जब बढ़ी ना डरी 'आरज़ू' ।
राग दीपक मगन हो के गाती रही ॥
-अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू' ©✍
10/04/2019
Comments
Post a Comment