Skip to main content

ग़ज़ल-धूप का ये सफर

बह्र-ए-मुत्दारिक  मुस्समन सालिम
अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
वज़्न- 212 212 212 212

              ग़ज़ल

धूप का ये सफर है सुहाना नहीं ।
धूप बिन पर मिले आबोदाना नहीं ॥

पत्तियाँ कब हरी हो सकीं धूप बिन ।
छाँव को ये हुनर तो है आना नहीं ॥

थक के बैठीं हैं आराम को दो घड़ी ।
तितलियों को गुलों से उड़ाना नहीं ॥

नेकियाँ जब करो भूल जाना उन्हें ।
कह के अहसां किसी पे जताना नहीं ॥

जानती हूँ कि हँसना भला है मगर ।
तन्ज़ करके कभी मुस्कुराना नहीं ॥

वक्त के साथ ये खुद ही भर जाएंगे ।
जख़्म अपने किसी को दिखाना नहीं ॥

धान की पीर को बेटियाँ जानती ।
जिस जगह ये उगें वो ठिकाना नहीं ॥

मायका सासरा दो जहां है मगर ।
बेटियों का कहीं आशियाना नहीं ॥

मुश्किलें है बहुत मंज़िलें दूर हैं ।
थक के तुम 'आरज़ू' हार जाना नहीं ॥

रचना तिथि 02/04/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
     -सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र

Comments

Popular posts from this blog

गरीबी गौरव गान

गरीबी  तो गौरव गान है । इसका बहुत सम्मान है । शबरी सा धीरज धर  के, कुछ तप भी करना पड़ता है । आस प्रभु की मन भरके, जग से लड़ना पड़ता है । तब बेर खाते श्री राम है ।। इसका बहुत सम्मान ह...

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...

कुछ मेरी भी तुम सुन लेते

सरला नारी को उन* लेते, सब निर्णय तुम खुद बुन लेते । मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं, *कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥* मेरा हर सृंगार तुम्ही से , बिछुए कंगन हार तुम्ही से । फिर भी मुझको भेज ...