गरीबी तो गौरव गान है ।
इसका बहुत सम्मान है ।
शबरी सा धीरज धर के,
कुछ तप भी करना पड़ता है ।
आस प्रभु की मन भरके,
जग से लड़ना पड़ता है ।
तब बेर खाते श्री राम है ।।
इसका बहुत सम्मान है ।।
छोड़ के छप्पन भोग कृष्ण को,
विदुर की कुटिया भायी।
वैभव से कहीं ज्यादा प्रभु को,
प्रीति गरीबी की ललचायी ।
लीला करते घनश्याम हैं ।।
इसका बहुत सम्मान है ।।
गरीबी तो गौरव गान है ।
इसका बहुत सम्मान है ।।
रचना तिथि 27 तीन 2018
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
-अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
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