Skip to main content

मुस्कुराते रहेंगे

बह्र -बहरे मुतकारिब मुसम्मन सालिम
अरक़ान- फ़ऊलुन  फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
वज़न - 122  122  122  122

               ग़ज़ल

ग़मो को छुपा मुस्कुराते रहेंगे ।
तबस्सुम लबों पर सजाते रहेंगे ॥

सियासत से पूछे वतन की ये माटी ।
रियाया को कब तक सताते रहेंगे ॥

नहीं इतनी प्यासी ज़मीं सरहदों की ।
लहू कब तलक यूँ बहाते रहेंगे ॥

जरा सी अना के लिए और कब तक ।
ये झूठी बिसातें बिछाते रहेंगे ॥

हवाओं सुनो ये हैं आशा के दीपक ।
उजाले हमेशा लुटाते रहेंगे ॥

खड़े राह में जो रुकावट के पर्वत ।
उन्हें हौंसलों से झुकाते रहेंगे ॥

सजा कर ग़मो की बहर क़ाफ़िये से ।
ग़ज़ल 'आरज़ू' गुनगुनाते रहेंगे ॥

रचना तिथि 01/04/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
   - सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा म प्र

Comments

Popular posts from this blog

सरस्वती वंदना

हों गीत मेरे, संगीत भरे । लय ना लय हो, सरगम मुखरे । माँ शारदा विनती करूँ तुझ से । हों ये गीत अनूप, अटल-ध्रुव से । मेरे गीतों को आशीष दे माँ । ये मोहन हों, मुरली को धरे ॥1॥ लय ना लय हो स...

'इंद्रधनुष' (दोहा गीत)

इंद्रधनुष छाये गगन,खिले धरा का रूप । कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारुप ॥ इंद्रधनुष सा नेह तो, सतरंगी संसार । रंग मिलें मिलकर सजें, पायें रूप अनूप ॥ कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्र...

हम्द-02 रब के बंदों से की महब्बत है

रब    के   बंदों  से   की  महब्बत  है अपनी  तो    बस   यही   इबादत  है सारी   तारीफ़   है   ख़ुदा   के   लिए जिसकी  दोनों  जहाँ  में  अज़मत है फूल     पत्तों    में    बेल    बूटों   में देखिए   रब   की   ही    इबारत   है शुक्र है  रब का  जो दिया  सो दिया अपनी क़िस्मत से कब शिकायत है ये   नमाज़ें    ज़कात    हज    रोज़े रब  को   पाने  की  ही   रवायत  है ग़म  में  भी   ढूंढ  ली   ख़ुशी   मैंने ये   हुनर   उसकी  ही   इनायत  है लाख    बेचैनियाँ    सही    लेकिन उसके   एहसास  से  ही   राहत है जिसके...