नामुमकिन को मुमकिन कर दे ऐसा जज़्बा जुनून है ।
कोशिश करने वालों के तो सारे रंग मरून हैं ।।
अपनी अपनी ज़िद पे अड़े हैं सीमा के दोनों ही छोर ।
वो भी अपनी माँ के बेटे हम भी तो हे सिरमोर ।।
पर मातृभूमि कब चाहती अपने बेटों का खून है ।।
नामुमकिन को मुमकिन कर दे ऐसा जज़्बा जुनून है ।।
संतुष्टि न हो तो अटारी चैन कहाँ पाती है ।
और कहीं तो छोटी सी कुटिया भी मुस्काती है ।
दुनिया है कितनी सुंदर गर अंतर्मन में सुकून है ।।
नामुमकिन को मुमकिन कर दे ऐसा जज़्बा जुनून है ।।
रचना तिथि 29 3 2018
रचना स्वरचित एवं मौलिक है
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी आरजू ✍
छिंदवाड़ा मप्र
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