वज़न 1222 1222 1222 1222
ग़ज़ल
खुदी को जो न पहचाने वही कस्तूर मांगा था ।
हमारे रहबररों ने क्या यही जम्हूर मांगा था ॥
सियासी साजिशें करके शराबी हम को ठहराया ।
हमें मालूम ही कब था कि क्यों अंगूर मांगा था ॥
मिटी है तीरगी दुनिया हमारी हो गई रोशन ।
खुदा की रहमतों का बस जरा सा नूर मांगा था ॥
जमाने भर की दौलत से तुम्हारा साथ था प्यारा ।
तुम्हारा हाथ था मांगा, न कोहेनूर मांगा था ॥
वही रिश्ते दिखाते हैं अकड़ जिनको कभी हमने ।
खुदा के सामने झुक झुक के बा दस्तूर मांगा था ॥
अकेले ये डगर मुश्किल मगर है ये सफर मुमकिन ।
तुम्हारा साथ राही हमने कब भरपूर मांगा था ॥
कड़ी है धूप जीवन की कली फिर भी खिली देखो ।
खुदा से 'आरज़ू' ने हौसला भरपूर मांगा था ॥
रचना तिथि 15/03/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू' ✍
छिंदवाड़ा मप्र
लाजवाब गज़ल है मित्र बधाई
ReplyDeleteBahut khub
ReplyDelete