आसमाँ पर बादलों की चित्रकारी चिट्ठियाँ शाम, शब, शबनम, शजर, गुल रब की प्यारी चिट्ठियाँ ले के आतीं हैं कभी उम्मीद के सूरज कई या कभी ढलती हुई शामों सी हारी चिट्ठियाँ रात में तारीक़ियाँ बढ़ने लगीं तो रब ने फिर चाँद तारे शम'अ सी रौशन उतारी चिट्ठियाँ दो घड़ी की ज़िंदगी का रोना रोना छोड़ कर गुल पे शबनम लिख रही है देख प्यारी चिट्ठियाँ उस शजर की हर हरी पत्ती ये सबसे कह रही धूप सह कर छाँव की लिक्खी है सारी चिट्ठियाँ ये परिंद...