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ग़ज़ल-10 आसमाँ पर बादलों की चित्रकारी चिट्ठियाँ

आसमाँ    पर    बादलों    की    चित्रकारी    चिट्ठियाँ शाम, शब, शबनम, शजर, गुल रब की प्यारी चिट्ठियाँ ले   के  आतीं   हैं   कभी   उम्मीद   के   सूरज   कई या   कभी  ढलती   हुई   शामों   सी   हारी   चिट्ठियाँ रात  में   तारीक़ियाँ   बढ़ने   लगीं  तो  रब   ने  फिर चाँद   तारे   शम'अ   सी    रौशन    उतारी   चिट्ठियाँ दो  घड़ी   की  ज़िंदगी   का   रोना  रोना  छोड़  कर गुल  पे  शबनम  लिख  रही  है  देख प्यारी  चिट्ठियाँ   उस  शजर  की  हर  हरी  पत्ती  ये  सबसे  कह रही धूप  सह  कर  छाँव  की  लिक्खी  है सारी चिट्ठियाँ ये  परिंद...

ग़ज़ल-09 जीती तलवार से हर बार क़लम की ताक़त

जीती  तलवार  से   हर  बार  क़लम  की  ताक़त जीत   के  पहने   गले   हार   क़लम  की  ताक़त पाठ   गीता  का   पढ़ाती  है   कभी   अर्जुन को रोकती   है   कभी  तक़रार   क़लम  की  ताक़त बुद्ध  का  ज्ञान  शरण  संघ   पिटक  में   भरकर हाँ  बदल  सकती  है  संसार  क़लम  की ताक़त सूर   रसखान   की   वाणी  में   संग   राधा   के गा  रही  कृष्ण  का  सिंगार  क़लम  की  ताक़त ओज  में  डूब  के  भूषण  की  क़लम  गाती  है सबको करती है  ये हुशियार  क़लम की ताक़त ये   जहालत   के   समुंदर   से   बचा  लेती  है बनके  मँझधार में  पतवार  क़लम...

ग़ज़ल-08 इन क़िताबों में निहा* है ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

इन  क़िताबों  में  निहा*   है   ज़िंदगी  का फ़लसफ़ा ये  ख़मोशी  से   बयाँ  करतीं   सदी  का  फ़लसफ़ा बनके ज़ीना* हर बशर को जीना+ सिखलाती क़िताब   इनमें  बातिन* है  बुलंदी की  ख़ुशी  का  फ़लसफ़ा ये  हमेशा  पैदा   करतीं  हैं   सियह   अल्फ़ाज़  से पढ़ने  वालों   के  दिलों  में  रौशनी  का  फ़लसफ़ा  क्या   क़िताबों   से  बड़ा   कोई    यहाँ  उस्ताद  है थाम  कर  उंगली  सिखातीं  रहबरी  का फ़लसफ़ा  हमसफ़र  बन  कर  सफ़र  आसान करती रात का हर  सफ़े  पर  है  चमकता  चाँदनी  का  फ़लसफ़ा इन  क़िताबों  में   हैं  गहरे   इल्म  के   दरिया  कई काश  मुझ  में  हो  हमेशा  तिश्नगी  ...

ग़ज़ल-07 गले मिलीं हैं यहाँ दो ज़बान काग़ज़ पर

गले   मिलीं  हैं  यहाँ  दो  ज़बान  काग़ज़  पर भरे  ये   हिंद   की   उर्दू   उड़ान  काग़ज़  पर  न  मज़हबों   की   है   दीवार   दरमियाँ  कोई कबीर   मीर  का   देखो   बयान   काग़ज़ पर रहीम   वृंद  के   दोहे   हों  या  के  हो  मानस मचा  के  धूम  रखे   कुल  जहान  काग़ज़ पर कहे  हैं  कितने  सवैये  किशन  की  चाहत में अदब की दुनिया में रसखान शान काग़ज़ पर नज़ीर   झूम   रहे    रंग  की   गा  कर  नज़्में है  जायसी  की  अमर  दास्तान  काग़ज़  पर सियासतों  ने  लगायी है  उलझनों की अगन है  बे सबब की बहस  खींचतान  काग़ज़ पर नहीं  है  घर  कोई  बेटी  का  इ...

ग़ज़ल-06 शम'अ जुगनू चाँद तारे रौशनी के हमसफ़र

शम'अ  जुगनू   चाँद  तारे   रौशनी  के हमसफ़र हैं  ये  कितने   माह -पारे*  रौशनी के हमसफ़र  जुलमतों  से  कब  ये  हारे  रौशनी  के हमसफ़र हौसले   जब   हैं   हमारे   रौशनी   के हमसफ़र अपनी धीमी सी ज़िया से शब को कर आरास्ता मह्र*  डूबा तो   सितारे   रौशनी   के  हमसफ़र  तीरगी  में   ज़िंदगी  की  आज़माइश  के   लिए करके  बैठे  हैं   किनारे  रौशनी   के   हमसफ़र नूर  के ज़ामिन* ये  जुगनू   घूमते   हैं  चार  सू  कब रहें  हो  कर इजारे*  रौशनी के  हमसफ़र  साज़िशों में हो  के शामिल ये  हवा के  साथ में कर भी सकते हैं  ख़सारे* रौशनी के हमसफ़र  वालदेन और हीरे जैसे,शम्स से उस्ताद अनीस*  हैं  मुकम्मल  ये   इदारे*  रौशनी...

ग़ज़ल-05 -मुझे गर वक़्त अव्वल लिख रहा है

मुझे  गर   वक़्त  अव्वल    लिख   रहा  है मेरे  वालिद  को  अफ़ज़ल   लिख  रहा  है मेरा    किरदार   उनका   नारियल - दिल बड़ी   सख़्ती  से   कोमल   लिख  रहा  है मेरे   अब्बा   की  रूदाद -ए - मशक्कत पुराना    एक    पीपल    लिख    रहा   है है  जो  रोज़ी  की   छागल   पास   उनके मेरा  दिल  उसको  बादल   लिख  रहा है मेरे   वालिद  की   मेहनत   का   पसीना मुअत्तर   एक    संदल    लिख   रहा   है जो  मुझ में  है  उन्हीं  सा  इक  जियाला सरल मुश्किल को  हर पल लिख रहा है अधूरी    'आरज़ू'   को   अज़्म   उनका मुनव्वर  और   मुकम्...

ग़ज़ल-04 -इस जहाँ में कोई माँ-सा पारसा मुमकिन नहीं

इस  जहाँ  में  कोई माँ-सा  पारसा*  मुमकिन नहीं  चाहे  जो    बेलौस*  ऐसा   आश्ना+ मुमकिन  नहीं  रूठ  जाए माँ  तो  कुछ  कहती नहीं  रोती  है बस माँ  के  जैसा  भी  हो  कोई  दूसरा  मुमकिन  नहीं माँ   बिना   दीपावली   के   दीप  भी  हैं   बेज़िया ईद  की  रौनक़ ये माँ  बिन  दे मज़ा मुमकिन नहीं हर  घड़ी  साये  सा  जब है  साथ में माँ का वजूद मुझको  तन्हाई   सताये   बाख़ुदा   मुमकिन  नहीं माँ की ख़िदमत हम करें ता-उम्र तो भी कम ही है माँ का  एहसाँ  उतरे  ऐसा  रास्ता  मुमकिन  नहीं माँ दुआ-ए-नूर*  दम करती  है मुझ पर तो भला   मेरी  राहों  में  अँधेरा   हो  घना   मुमकिन   नहीं मुस्कुराहट मेरे  लब  की  है ...