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चाणक्य छला जाता है

आधार छंद - सार/ललित छंद

गीत - चाणक्य छला जाता है

जलता है खुद दीपक सा पर, ज्ञान प्रकाश दिखाता ।
बांट के अपना सब सुख जन में, आनंदित हो जाता ।
इसके बदले शिक्षक जग से, देखो क्या पाता है ।
हर युग में चाणक्य सा कोई, हाय छला जाता है ॥

इंद्रासन ना ले ले तप से, मधवा भय से बोला ।
अहिल्या गौतम के अमृत से, जीवन में विष  घोला ।
विश्वामित्र की भंग तपस्या, छल से करवाई थी ।
सत्ता रक्षा को पृथ्वी पर, इंद्र परी आई थी ।
काम क्रोध मद लोभों का फिर, दोष मढ़ा जाता है ।
हर युग में चाणक्य सा कोई, हाय छला जाता है ॥

नेतृत्व से परिपूर्ण बनाके, गढ़ता कितने नेता ।
मंत्री हो या भूप सभी को, रुप यही है देता ।
पर सत्ता धारी बनते ही, लोग मदांध हुए हैं ।
काट दिए सिर उनके जिनके, झुक कर पांव छुए हैं ।
शस्त्र निपुण कर देने वाला, वाण यहां खाता है ।
हर युग में चाणक्य सा कोई, हाय छला जाता है ॥

नंद वंश ने एका की जब, बात एक ना मानी ।
चंद्रगुप्त सा शासक गढ़ के, याद दिलाई नानी ।
राजा की रक्षा का उपक्रम, दुर्घटना बन आया ।
बिंदुसार ने माँ की हत्या, का आरोप लगाया ।
अपने ही निर्मित शासन को, छोड़ चला जाता है ।
हर युग में चाणक्य सा कोई, हाय छला जाता है ॥

राष्ट्र निर्माता कहाता पर, अधिकार सभी छीने ।
बोलो कैसे चमका पाएं, तराशे विन नगीने ।
हाथ बांधकर कहते हैं ये, मटका गोल बनाओ ।
खरपतवार बिना काटे ही, स्वस्थ फसल उपजाओ ।
क्या कोई पतवार बिना उस, पार उतर पाता है ।
हर युग में चाणक्य सा कोई, हाय छला जाता है ॥

सेवा सेवा कह कर देखो, खूब जमाते सत्ता ।
छल से चलते पाते मोटा,  वेतन पेंशन भत्ता ।
मान नहीं जिनका कोड़ी का, वो खुद को पुजवाते ।
सच्चे सेवक शिक्षक पर, झूठे दोष लगाते ।
निंदा प्रस्तावक बन निंदित, नेता ही आता है ।
हर युग में चाणक्य सा कोई, हाय छला जाता है ॥

जलता है खुद दीपक सा पर, ज्ञान प्रकाश दिखाता ।
बांट के अपना सब सुख जन में, आनंदित हो जाता ।
इसके बदले शिक्षक जग से, देखो क्या पाता है ।
हर युग में चाणक्य सा कोई, हाय छला जाता है ॥

     -अंजुमन 'आरज़ू'  ©✍
      05/09/2019

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