Skip to main content

ग़ज़ल - फ़लसफ़ा

2122 2122 2122 212

                 ग़ज़ल

इन किताबों में निहां है ज़िंदगी का फ़लसफ़ा ।
ये खमोशी से बयां करतीं सदी का फ़लसफ़ा ॥

बनके ज़ीना हर बशर को जीना सिखलाती किताब ।
इनमें बातिन है बुलंदी की खुशी का फ़लसफ़ा ॥

स्याह है पर रोशनाई नाम यूं ही तो नहीं ।
ये कुतुब पर दिल से लिखती रोशनी का फ़लसफ़ा ॥

क्या किताबों से बड़ा कोई यहां उस्ताद है ।
थाम कर उंगली सिखातीं रहबरी का फ़लसफ़ा ॥

हमसफर बन कर सफ़र आसान करतीं रात का ।
हर सफ़े पर है चमकता चांदनी का फ़लसफ़ा ॥

इन किताबों में हैं गहरे इल्म के दरिया कई ।
काश मुझ में हो हमेशा तिश्नगी का फ़लसफ़ा ॥

सूफ़ियाना दिल में मेरे अब यही है 'आरज़ू' ।
ज़िंदगी भर मैं निभाऊं सादगी का फ़लसफ़ा ॥

     -अंजुमन आरज़ू  ©✍
04/09/2019

Comments

Popular posts from this blog

सरस्वती वंदना

हों गीत मेरे, संगीत भरे । लय ना लय हो, सरगम मुखरे । माँ शारदा विनती करूँ तुझ से । हों ये गीत अनूप, अटल-ध्रुव से । मेरे गीतों को आशीष दे माँ । ये मोहन हों, मुरली को धरे ॥1॥ लय ना लय हो स...

'इंद्रधनुष' (दोहा गीत)

इंद्रधनुष छाये गगन,खिले धरा का रूप । कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारुप ॥ इंद्रधनुष सा नेह तो, सतरंगी संसार । रंग मिलें मिलकर सजें, पायें रूप अनूप ॥ कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्र...

हम्द-02 रब के बंदों से की महब्बत है

रब    के   बंदों  से   की  महब्बत  है अपनी  तो    बस   यही   इबादत  है सारी   तारीफ़   है   ख़ुदा   के   लिए जिसकी  दोनों  जहाँ  में  अज़मत है फूल     पत्तों    में    बेल    बूटों   में देखिए   रब   की   ही    इबारत   है शुक्र है  रब का  जो दिया  सो दिया अपनी क़िस्मत से कब शिकायत है ये   नमाज़ें    ज़कात    हज    रोज़े रब  को   पाने  की  ही   रवायत  है ग़म  में  भी   ढूंढ  ली   ख़ुशी   मैंने ये   हुनर   उसकी  ही   इनायत  है लाख    बेचैनियाँ    सही    लेकिन उसके   एहसास  से  ही   राहत है जिसके...