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ग़ज़ल
इन किताबों में निहां है ज़िंदगी का फ़लसफ़ा ।
ये खमोशी से बयां करतीं सदी का फ़लसफ़ा ॥
बनके ज़ीना हर बशर को जीना सिखलाती किताब ।
इनमें बातिन है बुलंदी की खुशी का फ़लसफ़ा ॥
स्याह है पर रोशनाई नाम यूं ही तो नहीं ।
ये कुतुब पर दिल से लिखती रोशनी का फ़लसफ़ा ॥
क्या किताबों से बड़ा कोई यहां उस्ताद है ।
थाम कर उंगली सिखातीं रहबरी का फ़लसफ़ा ॥
हमसफर बन कर सफ़र आसान करतीं रात का ।
हर सफ़े पर है चमकता चांदनी का फ़लसफ़ा ॥
इन किताबों में हैं गहरे इल्म के दरिया कई ।
काश मुझ में हो हमेशा तिश्नगी का फ़लसफ़ा ॥
सूफ़ियाना दिल में मेरे अब यही है 'आरज़ू' ।
ज़िंदगी भर मैं निभाऊं सादगी का फ़लसफ़ा ॥
-अंजुमन आरज़ू ©✍
04/09/2019
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