वज़न -212 212 212
ग़ज़ल
सर पे है शामियां की तरह ।
ये दुआ आसमां की तरह ॥
इस ज़माने में मां के सिवा ।
कोई होगा न मां की तरह ॥
मुझको उसने लगाया गले ।
चूम कर बागबां की तरह ॥
उनको सदमा कि ग़म में भी हम ।
जी रहे शादमां की तरह ॥
वो जो मुश्किल में कतराते थे ।
साथ है कारवां की तरह ॥
हम ग़ज़ल में हक़ीक़त छुपा ।
कह रहे दास्तां की तरह ॥
'आरज़ू' रब की रहमत बिना ।
जीस्त है इंतिहां की तरह ॥
-अंजुमन आरज़ू ©✍
18/09/2019
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