वज़्न -122 122 122 122
ग़ज़ल
अनोखी ये दुनिया बदलती मिलेगी,
भरम में ये ख़ुद को ही छलती मिलेगी ।
जिन्होंने सिखाया है चलना संभल कर,
उन्हीं से बदल चाल चलती मिलेगी ।
अगर वक्त पर सच न सच को कहा तो ॥
ज़मी आसमा को निगलती मिलेगी ॥
कली जो लुटाती है खुशबू फ़िज़ा में ।
उन्हें ही फ़िज़ा ये मसलती मिलेगी ॥
ये कमज़र्फ़ इंसां सी छोटी नदी है
।
ज़रा आब पाया उछलती मिलेगी ॥
दिखाओ न यूं आइना दूसरों को ।
गिरेबां में अपने ही ग़लती मिलेगी ॥
जो चट्टान टूटी नहीं पत्थरों से ।
वो पानी से इक दिन पिघलती मिलेगी ॥
अगर बंद इक दर हुआ तो वहीं से,
नयी राह कितनी निकलती मिलेगी ।
हुई एक हसरत मुकम्मल तो दिल में,
नयी 'आरज़ू' फिर मचलती मिलेगी ।
-अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू' ©✍
26/09/2019
छिंदवाड़ा म• प्र•
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