वज़्न - 2122 2122 212
#ग़ज़ल
जो हैं दानां* वो सराबों में नहीं,
ज़िंदगी उनकी रूआबों में नहीं ।
जो पसीने में बसी ख़ुद्दार के,
वैसी ख़ुशबू सौ गुलाबों में नहीं ।
जो सुकूं माँ बाप की खिदमत में है,
वो सुकूं दूजे सवाबों में नहीं ।
जी रहे अतफ़ाल* बचपन जिस तरह,
शान ओ शौक़त वो नवाबों में नहीं ।
गिनता रहता है जो तुझको ग़म मिले,
क्या ख़ुशी तेरे हिसाबों में नहीं ।
तिश्नगी मेरे लबों की पी सके,
आब इतना इन चनाबों में नहीं ।
ज़िंदगी ने जो सिखाया 'आरज़ू',
वो सबक़ लिक्खा क़िताबों में नहीं ।
-अंजुमन 'आरज़ू' ©✍
30/09/2019
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शब्दकोष :-
*सराब= मृगतृष्णा, धोखा
*अतफ़ाल =बच्चे
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