ग़ज़ल
दूर परदेस में आब ओ दाना हुआ ।
आज बेटा भी घर से रवाना हुआ ॥
भूलकर फ़र्ज़ जब हक़ की चाहत बड़ी ।
रेज़ा रेज़ा हर इक आशियाना हुआ ॥
रच के साजिश किए तर्क़ रिश्ते सभी ।
मेरी बातों का तो बस बहाना हुआ ॥
तेल बाती दिये में हुई अनबनें ।
है अंधेरा न अब जगमगाना हुआ ॥
फिर न आए पलट कर कभी इस तरफ ।
छोड़ कर वो गए हैं ज़माना हुआ ॥
तेरी बातों से कुछ चोट ऐसी लगी ।
गम में डूबा हुआ ये तराना हुआ ॥
अब न बाकी रही कोई भी 'आरज़ू' ।
एक मुद्दत से दिल सूफियाना हुआ ॥
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
01/07/2019
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