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Showing posts from July, 2019

सूरज से बग़ावत

वज़्न    -   221 1222 221 1222 अर्कान -  मफ़ऊल मुफ़ाईलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन बह्र - बह्रे हज़ज मुसम्मन अख़रब _________________                ग़ज़ल सूरज को डुबोने को करता ये इबादत है । है चांद जिस से रोशन उसस...

न अब जगमग आना हुआ

ग़ज़ल दूर परदेस में आब ओ दाना हुआ । आज बेटा भी घर से रवाना हुआ ॥ भूलकर फ़र्ज़ जब हक़ की चाहत बड़ी । रेज़ा रेज़ा हर इक आशियाना हुआ ॥ रच के साजिश किए तर्क़ रिश्ते सभी । मेरी बातों ...